लो क सं घ र्ष !
लोकसंघर्ष पत्रिका
शनिवार, 29 नवंबर 2025
असम में चुनाव आयोग और भाजपा की जुगलबंदी -योगेंद्र यादव
असम में चुनाव आयोग और भाजपा की जुगलबंदी
-योगेंद्र यादव
कभी कभी एक छोटी से हरकत किसी व्यक्ति के चरित्र का पर्दाफाश कर देती है। ऐसा ही चुनाव आयोग के साथ हुआ। इसी २७ अक्टूबर को चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस कर देश के १२ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR यानी निर्वाचन सूची के “विशेष गहन पुनरीक्षण” का आदेश जारी किया। लेकिन उसमे असम शामिल नहीं था, हालांकि वहाँ भी अप्रेल में चुनाव होने वाले हैं। फिर चुनाव आयोग ने चुपचाप से १७ नवंबर को असम की मतदाता सूची के “विशेष पुनरीक्षण” का आदेश जारी किया। मीडिया ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया। लेकिन यह विचित्र आदेश चुनाव आयोग और बीजेपी की जुगलबंदी की कलई खोल देता है।
सबसे पहले आप याद कीजिए कि SIR के पक्ष में क्या दलील दी गई थी। पहले दिन से चुनाव आयोग की यही रट है कि SIR यह सुनिश्चित करने के लिए है कि केवल भारत का नागरिक ही वोटर बन सके। वोटर लिस्ट से विदेशी नागरिकों की छँटाई को चुनाव आयोग SIR का एक उद्देश्य बताता है। इसीलिए SIR में हर वोटर से नागरिकता का सबूत मांगा जा रहा है। इसीलिए चुनाव आयोग आधार कार्ड को पर्याप्त सबूत मानने के लिए तैयार नहीं है — चूँकि आधार कार्ड भारत की नागरिकता का सबूत नहीं है। चुनाव आयोग दबी जुबान से और बीजेपी प्रवक्ता उछल-उछल कर कहते हैं कि वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में विदेशी हैं, जिन्हें बाहर निकालने की जरूरत है।
अब आप अपने आप से पूछिए कि भारत में विदेशी अप्रवासियों की समस्या किस राज्य में सबसे गंभीर है। जाहिर है इस प्रश्न का एक ही उत्तर है — असम। मुद्दा आज का नहीं है, कम से कम ५० साल पुराना है। विदेशी अप्रवासियों के मुद्दे पर ऐतिहासिक असम आंदोलन हुआ। राजीव गांधी के समय नागरिकता के प्रश्न पर ही असम समझौता हुआ। पिछले चालीस बरस से उसे लागू करने पर विवाद चल रहा है। असम की वोटर लिस्ट में “डी वोटर” यानी डाउटफुल वोटर को चिन्हित करने पर बवाल मचा। इसे सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में असम में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) का सर्वे हुआ। देश में किसी और राज्य में नागरिकता की जांच को लेकर इतनी बड़ी कवायद और उसके बारे में इतना बड़ा बवाल कहीं नहीं हुआ।
अब पहली और दूसरी बात को जोड़कर उसका निष्कर्ष निकालिए — अगर देश में कहीं भी वोटर लिस्ट में नागरिकता की जांच की जरूरत है तो वह राज्य है असम। अगर SIR के पक्ष में दी गई दलील सच है तो SIR सबसे पहले असम में होना चाहिए था।
अब आप चुनाव आयोग की कारगुजारी को देखिए। जब अन्य राज्यों में SIR की घोषणा से असम को बाहर रखे जाने पर सवाल पूछा गया तो मुख्य चुनाव आयुक्त का जवाब था कि असम के नागरिकता के नियम बाकी देश से अलग हैं। इसलिए वहां का आदेश अलग आएगा। इसका अर्थ यही हो सकता था कि असम में SIR को बाक़ी देश की तुलना में ज़्यादा कड़ा बनाया जाएगा। बाक़ी देश में जहाँ २००२ की वोटर लिस्ट को प्रमाणित माना जा रहा है, वहाँ असम में १९७१ का प्रमाण मांगा जाएगा। और चूंकि एनआरसी के माध्यम से यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, इसलिए असम में वोटर लिस्ट का गहन ही नहीं गहनतम पुनरीक्षण होगा।
अब तैयार हो जाइए चुनाव आयोग की पलटबाज़ी के लिए। १७ नवंबर को चुनाव आयोग ने असम के लिए जो आदेश जारी किया है वो ज़्यादा कड़ा होने की बजाय आश्चर्यजनक रूप से उदार है। चुनाव आयोग ने SIR यानी “विशेष गहन पुनरीक्षण” से गहन शब्द को ग़ायब कर दिया है। असम में केवल “विशेष पुनरीक्षण” होगा। मामला सिर्फ़ शाब्दिक बदलाव का नहीं है। वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की छलनी को असम में ज़्यादा बारीक बनाने की बजाय चुनाव आयोग ने वहाँ इस छलनी को हटा दिया है।
इसका व्यावहारिक अर्थ देखिए। बाक़ी सारे देश में हर वोटर को एन्युमेरेशन फॉर्म (गणना प्रपत्र) भरना होगा, लेकिन असम में किसी को कोई फॉर्म नहीं भरना होगा। बीएलओ आपके घर आयेगा और वोटर लिस्ट में नामों की पुष्टि करेगा, जरूरत हो तो संशोधन करेगा। और बस हो गया पुनरीक्षण। बाक़ी देश में आपको २००२ की वोटर लिस्ट में अपना या अपने रिश्तेदार का नाम होने का सबूत देना होगा, अगर नहीं हो तो यह बताना होगा कि उस समय आपका परिवार कहाँ था। लेकिन असम में यह सवाल ही नहीं पूछा जाएगा। अगर आप २००२ का सबूत नहीं दे पाए तो बाक़ी देश के हर वोटर को दस्तावेज पेश करने होंगे, अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। लेकिन असम में इस झंझट को ख़त्म कर दिया गया है —किसी को कोई दस्तावेज दिखाने की ज़रूरत ही नहीं होगी। काश यह सरल, सुगम, और पारदर्शी व्यवस्था देश के हर राज्य में लागू होती।
सर चकरा गया ना आपका? एक कड़ी दवा पूरे देश को ज़बरदस्ती पिलायी जा रही है। कहा जा रहा है की एक ख़तरनाक बीमारी से बचने के लिए आपको इस दवा की ज़रूरत है। लेकिन जिस एक मरीज को वह बीमारी होने का प्रमाण है उसे बिना किसी दवा के हस्पताल से छुट्टी दी जा रही है।
अगर इस उलटबांसी को समझने में परेशानी हो तो यह अंतिम सुराग समझ लीजिए। दरअसल असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हर व्यक्ति के कागजों की जांच हो चुकी है। छह साल तक चली इस प्रक्रिया के अंत में असम में कुल १९ लाख ऐसे लोग पाए गए जो भारत की नागरिकता साबित नहीं कर पाए, जिनका नाम नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर से बाहर रखा गया। अब आप सोचेंगे की फिर तो चुनाव आयोग का काम आसान है — इन १९ लाख को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया जाय।
लेकिन असली खेल समझने के लिए आपको जानना होगा कि यह १९ लाख ग़ैर नागरिक कौन हैं? इनका वोट काटने से किसे नुक़सान होगा? इसके आंकड़े औपचारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन हर कोई जानता था कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से आये इस १९ लाख में अधिकांश मुसलमान नहीं बल्कि हिंदू हैं। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा में मीडिया के सामने बयान में स्वीकार किया कि इन १९ लाख में केवल ७ लाख मुसलमान हैं। बाक़ी हिंदू हैं — कुछ बंगाली हिंदू, कुछ असमी हिंदू तो कुछ गोरखा हिंदू। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि असम में बीजेपी ने बंगाली हिंदुओं में सबसे पहले अपनी पैठ बनायी थी। यानी कि अगर असम में वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण हो जाता और सभी १९ लाख नाम काट जाते तो सबसे बड़ा घाटा बीजेपी को होता।
अब आया खेल समझ में? चुनाव आयोग और बीजेपी में जुगलबंदी है या नहीं? या अब भी कोई शक बाक़ी है?
बुलडोजर बाबा की महिला दरोगा बोली - इतने जूते लगाऊंगी शक्ल भूल जाओगी
बुलडोजर बाबा की महिला दरोगा बोली - इतने जूते लगाऊंगी शक्ल भूल जाओगी
उत्तर प्रदेश के उन्नाव पुलिस का एक वीडियो इस समय सोशल मीडिया में काफी तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में महिला दरोगा एक बुजुर्ग महिला से कहती है कि सुनो ऐ बूढ़ा, सुनो मेरी, इतने जूते लगाएंगे कि शक्ल भूल जाऊंगी तुम। तुम्हारे बाप के नौकर नहीं हूं। बुजुर्ग महिला को हड़का रही महिला दरोगा उन्नाव सदर कोतवाली में तैनात हैं और इनका नाम उमा अग्रवाल है। महिला दरोगा डकौली गांव में एक मुकदमे से जुड़ा नोटिस तामील कराने पहुंची थीं।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2025
बाबा बुलडोजर नाथ के कार्यस्थली गोरखपुर में हिन्दुवत्व शर्मसार नहीं हो रहा है
बाबा बुलडोजर नाथ के कार्यस्थली गोरखपुर में हिन्दुवत्व शर्मसार नहीं हो रहा है
बेटे ने घर से निकाला, भटकते रहे मां-बाप, मरने के बाद भी नहीं पसीजा दिल... शोभा देवी की मौत पर जौनपुर के वृद्धाश्रम संचालक ने कही ये बात
गोरखपुर के किराना व्यापारी भुआल गुप्ता और उनकी पत्नी शोभा देवी को बेटे ने घर से निकाल दिया था, जिसके बाद वे जौनपुर के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे. शोभा देवी की मौत के बाद, बेटों ने अपने घर में फंक्शन का हवाला देते हुए शव को चार दिन डीप फ्रीजर में रखने को कहा और तत्काल लेने से मना कर दिया. इस बारे में वृद्धाश्रम संचालक ने पूरी कहानी बताई है...
जौनपुर स्थित एक वृद्धाश्रम से झकझोर देने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, यहां गोरखपुर की बुजुर्ग शोभा देवी अपने पति भुआल गुप्ता के साथ साल भर से रह रही थीं. उनके बेटों ने उन्हें घर में पनाह नहीं दी थी. काफी भटकने के बाद उन्हें ये वृद्धाश्रम नसीब हुआ था. बीते दिनों शोभा देवी की तबीयत बिगड़ गई, फिर भी कोई उन्हें देखने नहीं आया. सबसे हैरत की बात ये रही कि शोभा देवी की मौत के बाद भी बेटों ने बेरुखी दिखाई और तत्काल शव लेने की इच्छा नहीं जताई. उन्होंने वृद्धाश्रम वालों से कहा कि शव को चार दिन डीप फ्रीजर में रखवा दो, क्योंकि अभी उनके घर में फंक्शन है, इसलिए मां के शव को नहीं ले सकते. इस बारे में वृद्धाश्रम संचालक ने पूरी कहानी बयां की है.
आपको बता दें कि गोरखपुर के किराना व्यापारी भुआल गुप्ता को पारिवारिक विवाद के बाद उनके बड़े बेटे ने घर से निकाल दिया था. अवसाद में आकर भुआल अपनी पत्नी शोभा देवी के साथ सुसाइड करने रेलवे ट्रैक पहुंचे, लेकिन वहां मौजूद लोगों ने उन्हें अयोध्या या मथुरा जाने की सलाह दी. अयोध्या में कोई व्यवस्था न होने पर वे मथुरा गए, जहां से उन्हें जौनपुर के वृद्धाश्रम का पता मिला. वृद्धाश्रम चलाने वाले रवि कुमार चौबे ने दंपति को अपने यहां बुला लिया और उन्हें सहारा दिया.
रवि ने बताया कि कुछ महीने पहले शोभा देवी के पैर में दिक्कत आने पर उनका प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराया गया था, जिसकी दवा अभी भी चल रही है. मगर 19 नवंबर को शोभा देवी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई और आखिर में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.
भुआल गुप्ता ने अपने छोटे बेटे को फोन कर पत्नी शोभा देवी के निधन की सूचना दी. इसके बाद छोटे बेटे ने अपने बड़े भाई को कॉल कर जानकारी दी. मां के निधन की खबर मिलने पर बड़े बेटे ने ऐसा रवैया दिखाया जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया. उसने कहा कि मेरे बेटे की शादी है, घर में शव आएगा तो अपशगुन होगा, इसलिए शव को कम से कम 4 दिन डीप फ्रीजर में रखवा दो, बाद में अंतिम संस्कार किया जाएगा.
ये सुनकर वृद्धाश्रम के हेड रवि चौबे हैरान रह गए. उन्होंने भी बेटे से बात की. मगर बेटे का जवाब वही था- 'शव अभी नहीं लेंगे.' ऐसे में परिवार के दूसरे लोगों से बात की गई. आखिरकार शव गोरखपुर पहुंच गया. लेकिन वहां पर शव का अंतिम संस्कार करने के बजाय उसे दफना दिया गया. आरोप है कि बड़े बेटे ने कहा था कि चार दिन बाद शव को निकलवा लिया जाएगा और तब फिर अंतिम संस्कार किया जाएगा.
गुरुवार, 27 नवंबर 2025
भाजपा हटाओ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हटाओ, संविधान बचाओ देश बचाओ
नागपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शताब्दी वर्ष और संविधान दिवस के अवसर पर एक शक्तिशाली लाल फ्लैग मार्च।
सुबह सुबह से शहर लाल सागर में तब्दील हो गया, हजारों मजदूरों, किसानों, छात्रों और युवाओं ने भाजपा हटाओ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हटाओ, संविधान बचाओ देश बचाओ के नारे लगाए। ”
चिटनिस पार्क में, एक विशाल जनसभा की अध्यक्षता कॉमरेड तुकाराम भस्मे ने की थी, और कॉमरेड डॉ. भालचंद्र कांगो, कॉमरेड एड. सुभाष लांडे, कॉमरेड शाम काले, कॉमरेड तुकाराम भस्मे, कॉमरेड राजू देसले, और कॉमरेड युगल रायलू ने संबोधित किया, जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों, श्रमिकों के संघर्षों पर पार्टी के रुख की दृढ़ता से पुष्टि की और संविधान की रक्षा करते हुए।
मौजूद अन्य नेताओं में कॉमरेड डॉ महेश कोपुलवार, कॉमरेड शिवकुमार गणवीर, कॉमरेड अशोक सोनारकर, कॉमरेड सुनील मेटकर, कॉमरेड अनिल घाटे, कॉमरेड नयन गायकवाड, कॉमरेड देवराव चावले, कॉमरेड रविन्द्र उमटे, कॉमरेड मिलिंद गणवीर, कॉमरेड विनोद झोडागे, और कॉमरेड गजानन घोडे शामिल थे।
कॉमरेड धम्मा खडसे द्वारा एक उत्साही रेड गार्ड परेड और एक हलचल शाहिरी प्रदर्शन ने विदर्भ के युवाओं और लोगों के सामूहिक संकल्प को प्रदर्शित करते हुए सभा को सशक्त बनाया।
नागपुर का संदेश ज़ोरदार और स्पष्ट है: संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की रक्षा के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संघर्ष पूरी ताकत के साथ जारी रहेगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिंदाबाद!
एक शेरनी सौ लंगूर
क्षत्राणी नेहा सिंह राठौर का सम्मान हिन्दुवत्व वादियाँ को करना चाहिए। संत पुरुष कहलाने वाले पुलिस पीछे लगा रहे हैं।
बुधवार, 26 नवंबर 2025
कुंवर मोहम्मद अशरफ गांधीवादी कम्युनिस्ट
कुंवर मोहम्मद अशरफ गांधीवादी कम्युनिस्ट
-मोहम्मद सज्जाद
भारत का सबसे बड़ा प्रांत, उत्तर प्रदेश, चुनावों के लिए तैयार है। यह खुद को हृदयस्थल मानता है। यह सबसे ज़्यादा विधायक भेजता है। संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष देश बने रहने के बावजूद, बहुसंख्यकवाद आज भी एक प्रभुत्वशाली शक्ति है, जबकि इसकी जनसांख्यिकी में मुस्लिम समुदायों का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। ऐतिहासिक रूप से, उत्तर प्रदेश के मुसलमानों का एक वर्ग आर्थिक रूप से, विशेष रूप से भूमि-स्वामित्व के मामले में, और साथ ही राजनीतिक रूप से भी, मज़बूत और शक्तिशाली स्थिति में रहा है। यहाँ कुछ सबसे प्रभावशाली धर्मशास्त्रीय मदरसे हैं और यह कई सुधारवादी, पुनरुत्थानवादी, बौद्धिक आंदोलनों का केंद्र रहा है। यह वह प्रांत भी है जो हिंदू-मुस्लिम विवादों के कुछ सबसे बड़े मुद्दों, जैसे अयोध्या, काशी, मथुरा, का स्थल रहा है। उत्तर-औपनिवेशिक काल में, यह मुस्लिम अलगाववाद के प्रमुख केंद्रों में से एक था, हालाँकि यह उस मुस्लिम मातृभूमि का हिस्सा नहीं बनने वाला था जिसकी एक वर्ग माँग कर रहा था और अंततः औपनिवेशिक सत्ता के समर्थन से उसे वह मिल भी गया। जहां तक हिंदू-मुस्लिम संबंधों का सवाल है, इस तरह के विवाद समकालीन सामाजिक संबंधों और राजनीति को परेशान करते हैं और प्रभावित करते हैं।
ऐसे चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में, यह तथ्य कम ही जाना जाता है कि उपर्युक्त संस्थानों से निकले कुछ नेता, बुद्धिजीवी, बौद्धिक-कार्यकर्ता, समूह और ताकतें एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण के लिए आगे आईं जो आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से आधुनिक, बहुलवादी और समृद्ध हो। जहाँ देवबंद मदरसे ने हुसैन अहमद मदनी (1879-1957) और हिफ़्ज़ुर रहमान सियोहारवी (1901-1962) जैसे अलगाववाद-विरोधी और प्रखर बहुलवादी धर्मशास्त्री दिए, वहीं एएमयू ने तुफैल अहमद मंगलौरी (1868-1946) और कुंवर मोहम्मद अशरफ (1903-1962) जैसे प्रगतिशील लोगों को जन्म दिया।
यह स्तंभ क्रांतिकारी-वामपंथी इतिहासकार कुंवर मोहम्मद अशरफ के बौद्धिक और राजनीतिक जीवन से संबंधित है, जो जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के घनिष्ठ सहयोगी थे। हालाँकि, 1940 के दशक के प्रारंभ में कई रणनीतिक और वैचारिक मतभेदों के कारण वे दोनों से अलग हो गए। 1936 से 1948 तक वे कांग्रेस और भाकपा के साथ रहे। उन्होंने 1960 में जर्मनी जाने से पहले श्रीनगर और दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज (1956-60) में इतिहास पढ़ाया, जहाँ 1962 में बर्लिन में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य करते हुए उनका निधन हो गया।
केएम अशरफ़ को याद करने का कारण यह है: वे उन विद्वानों में से थे जिन्होंने औपनिवेशिक काल के अंत और स्वतंत्रता के बाद के दौर में मुसलमानों की राजनीति से जुड़ाव को सार्थक और रचनात्मक तरीके से पहचाना और व्यक्त किया। प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता, इक़बाल और मौदूदी पर, और आत्म-विश्लेषणात्मक चिंतन पर उनके स्पष्ट प्रहारों को अब फिर से याद करने की ज़रूरत है।
वर्चस्ववादी बहुसंख्यकवाद और मुस्लिम समुदायों के अभूतपूर्व हाशिए पर होने के मद्देनजर, अशरफ के अंग्रेजी और उर्दू भाषा के लेखन पर नजर डालना काफी शिक्षाप्रद होगा। वह वह व्यक्ति थे, जिन्होंने 1930 के दशक के आरंभ में भारतीय इतिहास के शोध छात्र के रूप में मुगल-पूर्व भारत के "लोगों के इतिहास" का पता लगाने का विकल्प चुना था। लंदन विश्वविद्यालय से उनकी डॉक्टरेट की उपाधि स्नातकोत्तर छात्रों के लिए एक लोकप्रिय पाठ्यपुस्तक है। लंदन में उनकी शिक्षा (डॉक्टरेट और कानून) अलवर राज्य द्वारा प्रायोजित थी। वोल्स्ले हैग (1865-1938) की देखरेख में उनकी डॉक्टरेट की थीसिस एक बेहद लोकप्रिय पुस्तक, लाइफ एंड कंडीशंस ऑफ द पीपल ऑफ हिंदुस्तान, 1200-1550 ईस्वी में बदल गई। यह याद रखना उचित होगा कि लुसिएन फेवरे (1878-1956) और अल्बर्ट मैथिएज (1874-1932) जैसे फ्रांसीसी इतिहासकार 1930 के दशक में "लोगों के इतिहास" के साथ प्रयोग कर रहे थे; ए.एल. मॉर्टन की 1938 की पुस्तक, ए पीपल्स हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड, उस समय एक अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक थी।
केएम अशरफ की यह पुस्तक भारत और विदेशों के कई विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में तुरंत लोकप्रिय और लोकप्रिय हो गई। तब से इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए। स्वतंत्रता के बाद, यह 1959 में पुनः प्रकाशित हुई। इसके उर्दू अनुवाद भी एक से अधिक संस्करणों में प्रकाशित हुए। इसने सुल्तानों पर निजी और सार्वजनिक व्यक्तियों के रूप में ध्यान केंद्रित किया, लेकिन ग्रामीण और शहरी जीवन, व्यापार और वाणिज्य, जीवन स्तर, लोगों के सामाजिक और घरेलू जीवन, उनके मनोरंजन और आमोद-प्रमोद पर अधिक ध्यान दिया और अकबर के शासनकाल से पहले इसे भारत में प्रकाशित किया।
अलीगढ़ के एक राजपूत मुस्लिम परिवार में जन्मे, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध उनकी राजनीतिक यात्रा बहुत पहले ही हिज़्बुल्लाह नामक एक संगठन के माध्यम से शुरू हो गई थी। उन्हें मुरादाबाद के अलीगढ़ से स्नातक इस्तफ़ा करीम के माध्यम से इसकी शुरुआत मिली, जहाँ केएम अशरफ़ उस समय प्रारंभिक शिक्षा के लिए रहते थे। उनका प्रवास अलीगढ़ के रसेलगंज स्थित बेगम हसरत मोहानी के 'स्वदेशी स्टोर' में हुआ। क्रांतिकारी कवि हसरत उस समय अपनी उर्दू पत्रिका, उर्दू-ए-मुअल्ला में साम्राज्यवाद-विरोधी लेखन के कारण कारावास की सजा काट रहे थे। तिलक के अनुयायी, हसरत एक मौलाना थे जो भगवान कृष्ण से प्रेम करते थे।
केएम अशरफ अलीगढ़ में स्नातक की पढ़ाई के दौरान असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी के सत्याग्रह में शामिल थे और इस तरह जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना में भी योगदान दिया। उन्हें अन्य विषयों के अलावा कुरान और गीता दोनों की शिक्षा दी गई। इस प्रकार, वे विविध विश्वदृष्टि के साथ पले-बढ़े। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा के बारे में उर्दू में लिखा।
उनकी बेहतरीन व्याख्याओं में से एक भारतीय इतिहास कांग्रेस (1960) के मध्यकालीन भारत खंड में उनके अध्यक्षीय भाषण में और उनकी उर्दू पुस्तक, "हिंदुस्तानी मुस्लिम सियासत पर एक नज़र" (1963) में मौजूद है , जिसे सज्जाद ज़हीर (1899-1973) ने मरणोपरांत प्रकाशित किया था। 2001 में, उनके बेटे जावेद अशरफ ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया। ये रचनाएँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
अध्यक्षीय भाषण (1960) में उन्होंने 19वीं सदी के अंत में इतिहास की पुस्तकों के औपनिवेशिक रूप से प्रेरित सांप्रदायिकरण पर विस्तार से प्रकाश डाला, विशेष रूप से जिसे उन्होंने 'भारत के राजनीतिक रूप से उन्नत प्रांत' कहा। इस संबंध में उन्होंने सर सैयद और ज़काउल्लाह के ऐतिहासिक लेखन की सराहना की। इसके बाद वे आत्म-आलोचनात्मक और आत्मनिरीक्षण करते हुए कहते हैं कि उनके उत्तराधिकारियों ने
'कथात्मक और वस्तुनिष्ठ इतिहास के पाठ्यक्रम को पुराने मुस्लिम साम्राज्यों की रक्षा के लिए क्षमाप्रार्थी के रूप में बदल दिया और समय के साथ भारत में मुस्लिम राजनीति की सांप्रदायिक और अलगाववादी प्रवृत्ति के साथ अपनी पहचान बना ली। यह प्रोफेसर एम. हबीब [1895-1971] ही थे जिन्होंने अपना इतिहास लिखकर... और आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति के सबसे बुरे दिनों में भी मुस्लिम अलगाववाद की बढ़ती प्रवृत्ति का साहसपूर्वक मुकाबला करके हमारे मन से इस मुस्लिम अंधराष्ट्रवाद के बारे में भ्रम दूर किया।'
अशरफ ने इतिहासकारों के समूह को आगाह किया कि यह प्रवृत्ति 'धार्मिक-पुनरुत्थानवादी छद्मावरण धारण कर रही है; अब यह स्पेंगलर जैसी छद्म-वैज्ञानिक शब्दावली का प्रदर्शन कर रही है और अलीगढ़ के इस युवा इतिहासकार को ऐसे भटकावों से सावधान रहना होगा।' उस समय बर्लिन में रहने वाले अशरफ ने भारत के इतिहासकारों को आगाह किया कि यूरोपीय और अमेरिकी विद्वान नए स्वतंत्र देशों के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तकें लिखने में नए सिरे से रुचि ले रहे हैं, हमारी 'आध्यात्मिक विरासत' पर तो ज़ोर दे रहे हैं, लेकिन 'कुछ भी सराहनीय नहीं जोड़ रहे हैं', जो उनके अनुसार भारतीय इतिहासकारों के लिए पूर्व उपनिवेशवादियों की मंशा को समझना एक 'चुनौती और ज़िम्मेदारी' है।
उन्होंने भारतीय इतिहास के औपनिवेशिक काल-विभाजन पर सवाल उठाया और गुप्तोत्तर काल के 'कबीलाई सामंतवाद' को मध्यकाल की शुरुआत बताया, जब ब्राह्मण पुरोहित वर्ग की सहायता से राजपूत कुलों ने 'तुर्कों और मुगलों के सैन्य-पितृसत्तात्मक सामंतवाद' को जन्म दिया, जिन्होंने कुबुलियत और पट्टा प्रथा के माध्यम से 'किसानों के साथ एक नए प्रकार के छद्म-संविदात्मक संबंध' स्थापित किए। बाद के मुगलों का सामाजिक परजीवीवाद युवा यूरोपीय पूंजीवाद के हाथों पराजित हो गया।
इसके बाद उन्होंने इस बात पर विचार किया कि किसान मध्यकालीन शासकों के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध में क्यों असमर्थ महसूस करते थे। केएम अशरफ़ भक्ति-सूफ़ी आंदोलनों को किसानों में विद्रोह की भावना को प्रेरित करने का श्रेय देते हैं, जो 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से और भी स्पष्ट रूप से प्रकट हुई, जब ऐसे आंदोलनों ने साम्राज्यों को चुनौती दी, लेकिन पिछड़े क्षेत्रीय साम्राज्यों में सिमट गए और अंततः यूरोपीय शक्तियों के आगे झुक गए।
1920 के दशक में, वे एएमयू के उन छात्रों में शामिल थे जो अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, जिसकी परिणति जामिया मिलिया इस्लामिया (जिसे बाद में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया) की स्थापना के रूप में हुई; 1937 में नेहरू ने अशरफ को जनसंपर्क अभियान का नेतृत्व सौंपा। अशरफ का मानना था कि 'कांग्रेस के नेतृत्व में कोई भी ईमानदार और निरंतर साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष मुस्लिम जनता को जिन्ना और पुनर्जीवित मुस्लिम लीग के बढ़ते प्रभाव से दूर कर देगा।' यह बात मुस्लिम लीग को बेहद चिंतित कर रही थी।
केएम अशरफ ने 1 जनवरी, 1939 को कलकत्ता में अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) की अध्यक्षता की। उन्होंने वहाँ एकत्रित युवा भारतीयों से 'भविष्य की ओर आत्मविश्वास से देखने' का आह्वान किया और स्पष्ट किया कि 'हमारा राष्ट्रीय संघर्ष एक बेहतर समाज व्यवस्था के लिए विश्व संघर्ष का एक हिस्सा है।' उन्होंने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत की विदेश नीति 'साम्राज्यवाद और फासीवाद के विरुद्ध कमज़ोर और शोषित मानवता की अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का एक ठोस उदाहरण' होगी। उन्होंने युवाओं के समूह के समक्ष स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि अखिल-इस्लामवाद, खिलाफत आंदोलन और हिंदू पुनरुत्थानवाद ने राष्ट्रीय संघर्ष के लिए लोगों को संगठित करने में मदद की होगी, लेकिन ऐसी घटनाओं के प्रतिगामी निहितार्थों को किसी से छिपाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उपनिवेशवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध भारत के संघर्ष का भविष्य किसानों, मज़दूरों और युवाओं की एकजुटता के हाथों में है, न कि किसी धार्मिक पहचान के संघ के निर्माण में। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम लीग के बंगाल मंत्रिमंडल की कड़ी आलोचना की और 'सांप्रदायिकता की विघटनकारी भूमिका' पर विस्तार से प्रकाश डाला, क्योंकि इस मंत्रालय ने जूट मिलों के मज़दूरों के बीच भी सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया था। उन्होंने यह टिप्पणी करते हुए समापन किया कि एआईएसएफ और अन्य युवा आंदोलनों को शहरी सीमाओं से आगे बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर फैलना होगा।
1941 में उन्हें दो साल के लिए देवली बंदी शिविर में कैद रखा गया, जहाँ उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं।
एनएल गुप्ता के साथ एक साक्षात्कार (27 अक्टूबर, 1960) में, अशरफ़ ने ख़ुद को कभी "गाँधी-वादी कम्युनिस्ट" बताया था, हालाँकि वैचारिक रूप से वे एक विशुद्ध भाकपा समर्थक बने रहे। इसी साक्षात्कार में उन्होंने भाकपा की मूर्खता को खुलकर स्वीकार किया था, जो मुस्लिम लीग के आत्मनिर्णय के नारे से गुमराह हो गई थी, जो उनके अनुसार वास्तव में मुस्लिम सांप्रदायिकता थी, और उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद और सांप्रदायिक राजनीति के पूरे इतिहास को भुला देने का अफ़सोस जताया था।
फिर भी, यहाँ यह जोड़ना उचित होगा कि अशरफ़ के लेखन का लहजा और भाव कभी-कभी थोड़ा व्यंग्यात्मक, कभी-कभी ज़्यादा अलंकारिक, कम प्रेरक होता है। यह शैली पढ़ने में आसान है, कुछ पंक्तियाँ और अंश रटने लायक हैं, लेकिन कुल मिलाकर, यह उस आकर्षण को खो देता है जो ऐसे विषयों में होना चाहिए। अशरफ़ के लेखन की एक और स्पष्ट सीमा यह है: जाति और लिंग के आधार पर दमनकारी प्रथाओं पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है।
इसके विपरीत, एएमयू के राजनीतिक दृष्टिकोण के ऐतिहासिक-वैचारिक और वर्ग-विश्लेषण पर उनके दो उर्दू निबंध (1955, 1960) अधिक महत्वपूर्ण रूप से व्यावहारिक, प्रेरक और लगभग पूरी तरह से गैर-बयानबाजी वाले हैं।
इन सीमाओं के बावजूद, केएम अशरफ की मुस्लिम राजनीति की ऐतिहासिक समझ प्रो. मुशीरुल हक (1933-1990) के लिए काफ़ी उपयोगी साबित हुई, जिन्होंने अशरफ की समझ पर अकादमिक रूप से गहन शोध किया। यह बात प्रो. मुशीरुल हक के व्याख्यान (एएमयू ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन, दिल्ली द्वारा 1988 में आयोजित) में सबसे बेहतरीन और सारगर्भित रूप से व्यक्त की गई है, जिसका विषय था "धर्म और भारतीय मुस्लिम राजनीति: अतीत और वर्तमान"। यह याद रखना ज़रूरी है कि 1980 का दशक भारत में बेहद प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता का दशक था, जबकि उस समय कोई भी अति-बहुसंख्यक राजनीतिक दल सत्ता में नहीं था।
मंगलवार, 25 नवंबर 2025
कम्युनिस्ट नेता हसन नासिर जिनकी हत्या पाकिस्तानी हुक्मरानों ने करा दिया था
कम्युनिस्ट नेता हसन नासिर जिनकी हत्या पाकिस्तानी हुक्मरानों ने करा दिया था
मत समझो हमने भुला दिया, हर लहज़ा तुम को याद रखा
-ज़ाहिदा हिना
विचारक व शायर हसन नासिर।
हमारे यहां का पुराना पढ़ा-लिखा तबका हसन नासिर के बारे में जरूर जानता है। वे हमारे उपमहाद्वीप की एक बेमिसाल शख़्सियत थे। एक आदर्शवादी दानिश्वर और अदीब। वे हैदराबाद दक्षिण (जिसे हम हिंदुस्तान में तेलंगाना कहा जाता है) के एक मशहूर अशर्फिया ख़ानदान में पैदा हुए थे। उन्हें आला तालीम लेने के लिए विलायत भेजा गया लेकिन वे तो शायराना मिजाज़ रखते थे। इसलिए काग़जी इल्म में उनका मन कहां लगता। उनके परिवार के लोग उन्हें सिविल सर्विस के लिए भेजना चाहते थे, पर वे तो शामिल हो गए कम्युनिस्ट तहरीक में। महज़ बीस साल की उम्र में ही उन्होंने इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी में इतनी जगह बना ली कि बड़े-बड़े कम्युनिस्ट नेता उनका एहतराम करने लगे। वे पाकिस्तान आ गए और उन्होंने जी जान से पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने लगे। हसन नासिर कराची में लगभग दस साल रहे। वहां उन्होंने अपना ज़्यादातर वक़्त भूमिगत रहने और सिक्युरिटी वालों से बचने में गुज़ारा। हसन नासिर से मार्क्सवाद की इल्म लेने वाले मोहम्मद अली का कहना है था कि हसन नासिर का कोइ स्थाई घर नहीं था और उनके खाने-पीने और सोने-जागने का कोई भी तय वक़्त नहीं था। सब बेक़ायदा था। मोहम्मद अली के मुताबिक़ वे गली में मिलने वाला सादा खाना ही खा लिया करते थे। उन्हें पार्क की बेंच, पार्टी ऑफिस या किसी भी मज़दूर के क्वार्टर में थोड़ी-सी जगह मिल जाती तो वहीं सो जाया करते थे।
वे किसी दोस्त की मुख़बिरी पर गिरफ्तार हो गए। कराची से लाहौर ले जाए गए जहां के शाही किले में उन पर बहुत भयानक ज़ुल्म किए गए और आख़िरकार वे हलाक कर दिए हो गए। जिस समय वे हलाक किए गए, उस वक्त उनकी उम्र महज 32 साल थी। हालांकि पाकिस्तानी सरकार का कहना था कि उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली। हालांकि ये बात बिल्कुल ग़लत थी क्योंकि हसन नासिर इतने कमजोर इंसान कतई नहीं थे जो ख़ुदकुशी कर लें, भयानक जु़ल्मों और सितम के बावजूद। उनका पूरा ख़ानदान हैदराबाद दक्षिण में रहता था और आज भी रहता है।
हसन नासिर की वालिदा बेगम अलमदार हुसैन को उनके वहशियाना क़त्ल की इत्तेला मिली तो वे एक काला ताबूत लेकर पाकिस्तान पहुंची, ताकि हसन नासिर के बेजान जिस्म को हैदराबाद दक्षिण ले जाएं। लेकिन सरकार आखिर उनको हसन नासिर की लाश कैसे दे सकती थी? भयावह ज़ुल्मो-सितम के कारण भयावह स्थिति में थी। इसलिए किसी पुरानी क़ब्र से एक गुमनाम लाश निकालकर हसन नासिर की मां को सौंप दी गई। इतनी बेहयाई तो कोई शैतान भी नहीं करता है। लेकिन उन्होंने की। जाहिर सी बात थी, हसन नासिर की वालिदा ने इस लाश को अपने बेटे की लाश मानने से इंकार कर दिया और ख़ाली हाथ खा़ली ताबूत लेकर वापस लौट आईं।
हसन की रुख़्सत को करीब 59 साल हो गए हैं, लेकिन वे अपने आदर्शवादी साथियों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं। हर साल 13 नवंबर को उनकी याद मनाई जाती है। इस मौके पर उन्हे ंचाहने वाले एक गीत गाते हैं :
मत समझो हमने भुला दिया,
ये चांदनी रात ये सुनहरी किरन
इस जगमग रात का एक एक पल
हम ने तुम से आबाद रखा
हर लहज़ा तुम को याद रखा।
सोमवार, 24 नवंबर 2025
सिंघम आर एस यादव ने बताया कि 39 जूते चौटाला ने मारे थे। पुलिस सेवा में ऐसा होने पर कोई राज नही खोलता है
सिंघम आर एस यादव ने बताया कि 39 जूते चौटाला ने मारे थे। पुलिस सेवा में ऐसा होने पर कोई राज नही खोलता है।
रिटायर्ड आईपीएस का सनसनी खेज खुलासा !
मुझे चौटाला थाने में उल्टा लिटाकर जूत्तों से पीटा गया !
थानेदार की कुर्सी पर खुद अभय बैठा हुआ था !!!!!!
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